स्वास्थ्य / प्राकृतिक चिकित्सा

स्वस्थ रहना हो तो खाने पकाने विधि की को बदलें

B. Rao 2018-10-02 13:58:50


स्वस्थ एवं नीरोग रहने के लिए कड़ी भूख लगने पर चबा- चबाकर खाएँ इस बहुमूल्य शर्त का नियमित पालन करने से ही पाचन ठीक तरह से होता चलता है तथा पेट में किसी तरह की शिकायत होने की संभावना नहीं रहती है। इसके लिए प्रायः निर्देश दिया जाता है- प्रातः तथा संध्या, खाने के लिए समय निर्धारित कर लें तथा जब चाहें, तब खाने से बचें। बार- बार मुँह चलाने तथा पेट में खाद्य पदार्थों को अनियंत्रित रूप से पहुँचाते रहने से भोजन ठीक तरह से कभी पच नहीं पाता। साथ ही भोज्य पदार्थ को सही रूप में चबायें ताकि उसमें पाचक रस की उपयुक्त मात्रा समाविष्ट करने का काम दाँत का ही है। यदि उसका उपयोग किया गया है और जल्दी- जल्दी में भोजन को पेट की भट्ठी में झोंक दिया तो इसका परिणाम अपच दस्त तथा गैस उत्पत्ति के रूप में अनुभव किया जा सकता है। 

      
खाने के साथ- साथ पकाने की गलत विधि से भी खाद्य पदार्थो के अधिकांश पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। तलनेभूनने  मिर्च- मसाले के समावेश के कारण वह जायकेदार तो अवश्य बन जाता है, परंतु स्वास्थ्य की दृष्टि से वह निरूपयोगी  बेकार ही साबित होता हैं। 

   
जहाँ कीटनाशक दवाईयाँ छिड़की जाती हैं वहाँ छिलको में वे सोख ली जाती हैं- इस लिए उनको अच्छी तरह धोकर या नमक के पानी से धोकर ही खाना उचित है। 

  
अनाजों में भी पोषक तत्वों की अधिकांश मात्रा उसके बाह्य परतों शीर्ष भाग में विद्यमान होती है, परंतु वर्तमान फैशनपरस्ती का शिकार अनाजों को भी होना पड़ा है। देखने में वह स्वच्छ चमकीले तारे सदृश लगें, इसके लिए उसकी मिलों में घिसाई पिसाई की जाती है। चावल,दाल आदि की स्थिति यही है ।। गेहूँ को भी चक्की में पीसने तथा घर में उसके आटे से चोकर को पृथक कर डालने की प्रक्रिया अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। चावल को खाना बनाने से पूर्व बार- बार धोया जाता है तथा पका लेने के उपरांत उसके अतिरिक्त जल(माँड) को फेंक दिया जाता है।
   
खाद्य पदार्थों में पोषक तत्वों को बचाने के लिए उसे अधिक उबालने तलनेभूनने के स्थान पर प्रेशर कूकर अथवा भाप से खाना पकाने की विधि अपनानी चाहिए। खाना कम तापमान पर पकाया जाए, कम समय में उसे तैयार किया जाए तथा कम चौड़े बर्तन में उसे पकाया जाए। 
   
प्राचीन समय में व्यंजनों को रंगयुक्त बनाने के लिए केसर, धनिया अन्य वनस्पतियों को प्रयुक्त किया जाता था। परंतु आज इसका स्थान कृत्रिम रंगों ने ले लिया है। इस समय विश्व में अधिकतर कृत्रिम रंगों का प्रयोग हो रहा है। भारत में ही अनेक कृत्रिम रंगों का आम प्रचलन है। आश्चर्य तो इस बात का है कि इन रंगों के खतरनाक साबित हो जाने के बाद भी इनका प्रयोग बढ़ता जा रहा है। परिणाम स्वरूप अनेकानेक रोग उत्पन्न होते पाये जा रहे हैं, जैसे प्रजनन अंग, पेट जिगर का क्षतिग्रस्त होना, शरीर का विकास रूकना, खून में लाल कणों की कमी, जिगर पर छाले पड़ना आदि। बुद्धिमानी इसी में है कि हम इन अनुपयुक्त अप्राकृतिक पदार्थों का सेवन करें।