धर्म / आस्था

कैसे पहुंचता है पितरों को भोजन

B. Rao 2018-09-28 16:19:49


जैसे पशुओं का भोजन तृण और मनुष्यों का भोजन अन्न कहलाता है, वैसे ही देवता और पितरों का भोजन अन्न का सार तत्व है। सार तत्व अर्थात गंध, रस और ऊष्मा।

 

* देवता और पितर गंध तथा रस तत्व से तृप्त होते हैं। दोनों के लिए अलग-अलग तरह के गंध और रस तत्वों का निर्माण किया जाता है। विशेष वैदिक मंत्रों द्वारा विशेष प्रकार की गंध और रस तत्व ही पितरों तक पहुंच जाती है।

 

 

* एक जलते हुए कंडे पर गुड़ और घी डालकर गंध निर्मित की जाती है। उसी पर विशेष अन्न अर्पित किया जाता है। तिल, अक्षत, कुश और जल के साथ तर्पण और पिंडदान किया जाता है। अंगुलियों से देवता और अंगूठे से पितरों को जल अर्पण किया जाता है।

 

* पितरों और देवताओं की योनि ही ऐसी होती है कि वे दूर की कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा-अन्न भी ग्रहण कर लेते हैं और दूर की स्तुति से भी संतुष्ट होते हैं। इसके सिवा ये भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ जानते और सर्वत्र पहुंचते हैं।

 

 

* मृत्युलोक में किया हुआ श्राद्ध उन्हीं मानव पितरों को तृप्त करता है, जो पितृलोक की यात्रा पर हैं। वे तृप्त होकर श्राद्धकर्ता के पूर्वजों को जहां कहीं भी उनकी स्थिति हो, जाकर तृप्त करते हैं।

 

 

* अत: श्राद्धपक्ष में पितरों का पिंडदान और तर्पण कर अपनों को भोजन कराना चाहिए। श्राद्ध ग्रहण करने वाले नित्य पितर ही श्राद्धकर्ताओं को श्रेष्ठ वरदान देते हैं।