धर्म / आस्था

श्राद्ध-कर्म में पिंड का है विशेष महत्व

B. Rao 2018-09-27 00:19:19


 श्राद्ध के लिए चावल को मिट्टी के हंडिया में पकाकर उसका लड्डू बनाया जाता है। श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके पिंड बनाते हैं, उसे 'सपिण्डीकरण' कहते हैं। पिण्ड का अर्थ है शरीर। यह एक पारंपरिक विश्वास है, जिसे विज्ञान भी मानता है कि हर पीढ़ी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में पहले की पीढ़ियों के समन्वित 'गुणसूत्र' उपस्थित होते हैं।

चावल के पिंड जो पिता, दादा, परदादा और पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, आपस में मिलकर फिर अलग बांटते हैं। उसके बाद उसे पत्तल पर रखते हैं। किसी पात्र में दूध, जल, काला तिल और पुष्प लेकर कुश के साथ तीन बार तर्पण करना होता है। बाएं हाथ में जल लेकर दाएं दाहिने हाथ के अंगूठे को पृथ्वी की तरफ करते हुए चावल के लड्डुओं पर डाला जाता है। पितरों के निमित्त सारी क्रियाएं बाएं कंधे में जनेऊ डालकर और दक्षिण की ओर मुख करके की जाती है।

प्रत्येक व्यक्ति के तीन पूर्वज पिता, दादा और परदादा क्रम से वसु, रुद्र और आदित्य के समान माने जाते हैं। श्राद्ध के समय वे ही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। मान्यता है कि रीति-रिवाजों के अनुसार कराए गए श्राद्ध-कर्म से तृप्त होकर पूर्वज अपने वंशधर को सपरिवार सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य का आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध-कर्म में उच्चारित मंत्रों और आहुतियों को वे अन्य सभी पितरों तक ले जाते हैं।